पूर्वांचल राज्य की मांग फिर हुई तेज
उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से यानी पूर्वांचल में एक बार फिर पृथक राज्य की मांग तेज हो गई है। सामाजिक संगठनों, युवाओं और क्षेत्रीय जनआंदोलन से जुड़े लोग लगातार अलग पूर्वांचल राज्य के गठन की मांग उठा रहे हैं। पूर्वांचल राज्य जनआंदोलन के कार्यकारी संयोजक हरवंश पटेल का कहना है कि “पूर्वांचल का विकास अब अलग राज्य बनने के बाद ही संभव है।”
आखिर क्यों उठ रही है अलग पूर्वांचल राज्य की मांग?
पूर्वांचल में वाराणसी, गोरखपुर, प्रयागराज, चंदौली, गाजीपुर, बलिया, जौनपुर, मऊ, देवरिया, भदोही समेत कई जिले शामिल हैं। यह क्षेत्र जनसंख्या, संसाधन और सांस्कृतिक विरासत के बावजूद लंबे समय से विकास की दौड़ में पीछे माना जाता रहा है।
1. बेरोजगारी और पलायन सबसे बड़ी समस्या
पूर्वांचल का युवा रोजगार की तलाश में मुंबई, दिल्ली, गुजरात और पंजाब जैसे राज्यों में पलायन करने को मजबूर है। स्थानीय स्तर पर बड़े उद्योगों और रोजगार के अवसरों की भारी कमी है।
हरवंश पटेल का कहना है कि यदि पूर्वांचल अलग राज्य बनेगा तो स्थानीय उद्योग, MSME सेक्टर, कृषि आधारित उद्योग और IT हब विकसित किए जा सकेंगे।
2. स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल स्थिति
पूर्वांचल के ग्रामीण इलाकों में आज भी बेहतर अस्पताल और चिकित्सा सुविधाएं नहीं हैं। गंभीर मरीजों को इलाज के लिए लखनऊ या दिल्ली भेजा जाता है।
अलग राज्य बनने के बाद स्वास्थ्य बजट और मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है।
3. किसानों की समस्याएं
पूर्वांचल का किसान बाढ़, सूखा और खराब सिंचाई व्यवस्था से जूझता रहता है। कई जिलों में किसानों को फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अलग राज्य बनने पर कृषि आधारित योजनाएं तेजी से लागू की जा सकती हैं।
4. विकास में क्षेत्रीय असंतुलन
पूर्वांचल के कई जिले आज भी खराब सड़क, शिक्षा और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं से जूझ रहे हैं। लोगों का आरोप है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजधानी क्षेत्र की तुलना में पूर्वांचल को कम प्राथमिकता मिली।
5. सांस्कृतिक पहचान का मुद्दा
भोजपुरी, लोक संगीत, लोक कला और पूर्वांचल की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर वह सम्मान नहीं मिल पाया जिसकी अपेक्षा की जाती है।
अलग राज्य बनने पर क्षेत्रीय भाषा और संस्कृति को नई पहचान मिल सकती है।
छोटे राज्य बनने से क्या होगा फायदा?
भारत में उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्यों के गठन के बाद प्रशासनिक कार्यों में तेजी देखने को मिली। पूर्वांचल समर्थकों का मानना है कि छोटा राज्य बनने से:
- प्रशासन आसान होगा
- विकास योजनाएं तेजी से लागू होंगी
- युवाओं को स्थानीय रोजगार मिलेगा
- स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था बेहतर होगी
- क्षेत्रीय समस्याओं का समाधान जल्दी होगा
हरवंश पटेल ने क्या कहा?
पूर्वांचल राज्य जनआंदोलन के कार्यकारी संयोजक हरवंश पटेल ने कहा:
“पूर्वांचल केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की उम्मीद और अधिकार की लड़ाई है। अब समय आ गया है कि पूर्वांचल को उसका अपना राज्य मिले।”
निष्कर्ष
पूर्वांचल राज्य की मांग अब केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि विकास, रोजगार और क्षेत्रीय अधिकार का बड़ा आंदोलन बनती जा रही है। आने वाले समय में यह मुद्दा उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा प्रभाव डाल सकता है

