'खाकी' की मनमानी पर हाई कोर्ट का बड़ा चाबुक! गैर-कानूनी हिरासत के लिए पुलिस को लगा 25,000 रुपये का जुर्माना

'खाकी' की मनमानी पर हाई कोर्ट का बड़ा चाबुक! गैर-कानूनी हिरासत के लिए पुलिस को लगा 25,000 रुपये का जुर्माना

कानून सबके लिए बराबर है, चाहे वो आम नागरिक हो या वर्दीवाला।" इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में अपने एक ऐतिहासिक फैसले से इस बात को एक बार फिर सच साबित कर दिखाया है।


'खाकी' की मनमानी पर हाई कोर्ट का बड़ा चाबुक! गैर-कानूनी हिरासत के लिए पुलिस को लगा 25,000 रुपये का जुर्माना
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पूर्वांचल न्यूज प्रिंट / प्रयागराज: "कानून सबके लिए बराबर है, चाहे वो आम नागरिक हो या वर्दीवाला।" इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में अपने एक ऐतिहासिक फैसले से इस बात को एक बार फिर सच साबित कर दिखाया है। कोर्ट ने न सिर्फ एक आम नागरिक के अधिकारों की रक्षा की, बल्कि मनमानी करने वाले पुलिसकर्मियों को कड़ा सबक भी सिखाया है।


जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस संजीव कुमार की बेंच ने प्रयागराज के रहने वाले एक नागरिक को 24 घंटे तक अवैध रूप से थाने में बंद रखने के लिए 25,000 रुपये का अंतरिम मुआवजा देने का आदेश जारी किया है।


 क्या था पूरा मामला? (जब पुलिस बन गई 'पंच परमेश्वर')


यह मामला 26 नवंबर 2022 का है। प्रयागराज के मातंबर मिश्रा अपने खेतों से घर लौट रहे थे। तभी एक मामूली घरेलू विवाद की शिकायत पर पुलिस स्टेशन के सब-इंस्पेक्टर (SI) सूर्य प्रकाश दुबे उनके घर में घुसे और उन्हें कुर्ता-लुंगी में ही घसीटते हुए थाने ले गए।


  • 24 घंटे की कैद: बिना कोई सही वजह बताए मिश्रा जी को एक दिन के लिए लॉकअप में बंद कर दिया गया।
  • रिश्वत की मांग: आरोप है कि उन्हें छोड़ने के बदले ₹20,000 की रिश्वत भी मांगी गई।
  • पुलिस का अजीब बहाना: जब मामला कोर्ट पहुंचा, तो SI साहब ने दलील दी कि मिश्रा जी तो "अपनी मर्जी से समझौता करने" थाने आए थे।


हाई कोर्ट की दो टूक टिप्पणी


कोर्ट ने पुलिस की इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा— "सब-इंस्पेक्टर दुबे कोई आध्यात्मिक गुरु, पंच परमेश्वर या समाज के मुखिया नहीं हैं, जिनके पास लोग अपनी मर्जी से सलाह लेने जाएं। लोग पुलिस की ताकत से डरते हैं।"


 गलती छिपाने के लिए 'घबराहट' में उठाया कदम


कोर्ट ने पकड़ा कि अपनी गलती छुपाने के लिए पुलिस ने मिश्रा जी को छोड़ने के दो दिन बाद उन पर शांति भंग करने (CrPC 107/116) की कार्रवाई कर दी। कोर्ट ने साफ कहा कि यह सब पुलिस ने "घबराहट में खुद को बचाने के लिए" किया था, जिसका घरेलू विवाद से कोई लेना-देना नहीं था।


हाई कोर्ट ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि कुछ पुलिस अधिकारी अक्सर यह सोचकर नागरिकों के अधिकारों का हनन करते हैं कि "हजारों में से कोई एक ही कोर्ट तक पहुंच पाएगा और उनके गलत काम पर किसी का ध्यान नहीं जाएगा।"


 इस फैसले की 3 सबसे बड़ी बातें


मांगा नहीं, फिर भी मिला न्याय: पीड़ित ने कोर्ट से सिर्फ जांच की मांग की थी, पैसों की नहीं। लेकिन हाई कोर्ट ने अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि बुनियादी अधिकारों के हनन पर मुआवजा देना कोर्ट की जिम्मेदारी है।


सिर्फ फटकार काफी नहीं: कोर्ट ने माना कि पुलिस वालों को सिर्फ विभागीय फटकार लगाना काफी नहीं है, क्योंकि इससे उनके करियर पर असर नहीं पड़ता। जेब से पैसा जाना जरूरी है!


30 दिनों में भुगतान: यूपी सरकार की 2021 की पॉलिसी के तहत कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि 30 दिनों के भीतर पीड़ित को ₹25,000 का मुआवजा दिया जाए।


सीधी बात: यह फैसला हम सभी को याद दिलाता है कि भारत का संविधान हर नागरिक को सम्मान से जीने और स्वतंत्रता का अधिकार (आर्टिकल 21) देता है। अगर कोई भी इसका उल्लंघन करेगा, तो देश की अदालतें चुप नहीं बैठेंगी!