साहित्यिक रचनाएं समाज को सही मार्ग दिखाने के साथ-साथ उसकी सांस्कृतिक मौलिकता और विरासत को सुरक्षित रखने का कार्य करती हैं। यह विचार प्रख्यात साहित्यकार एवं पद्मश्री सम्मानित डॉ. विद्या बिंदु ने लखनऊ के विनीत खंड स्थित बुद्ध इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित एक भव्य साहित्यिक समारोह में व्यक्त किए।
- भारत रत्न एवं तिरंगा ध्वज संघर्ष यात्रा पुस्तक का भव्य लोकार्पण, देशभर के साहित्यकारों ने किया काव्य-पाठ
लखनऊ। साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं, बल्कि उसकी दिशा और दशा निर्धारित करने वाला महत्वपूर्ण माध्यम है। साहित्यिक रचनाएं समाज को सही मार्ग दिखाने के साथ-साथ उसकी सांस्कृतिक मौलिकता और विरासत को सुरक्षित रखने का कार्य करती हैं। यह विचार प्रख्यात साहित्यकार एवं पद्मश्री सम्मानित डॉ. विद्या बिंदु ने लखनऊ के विनीत खंड स्थित बुद्ध इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित एक भव्य साहित्यिक समारोह में व्यक्त किए।
यह कार्यक्रम साहित्यकार पत्रा लाल गुप्त ‘विवश’ द्वारा रचित चर्चित पुस्तकों ‘भारत रत्न’ एवं ‘तिरंगा ध्वज संघर्ष यात्रा’ के लोकार्पण, सम्मान समारोह तथा काव्य गोष्ठी के अवसर पर आयोजित किया गया। कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों से आए साहित्यकारों, विद्वानों, पत्रकारों और समाजसेवियों ने भाग लिया।
साहित्य समाज को देता है नई दिशा
उन्होंने लेखक पत्रा लाल गुप्त ‘विवश’ की रचनात्मकता की सराहना करते हुए कहा कि ऐसी कृतियां राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और युवा पीढ़ी को अपने इतिहास, संस्कृति तथा राष्ट्रीय मूल्यों से जोड़ती हैं।
‘भारत की आत्मा को अभिव्यक्त करती हैं ऐसी रचनाएं’
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रोफेसर सूर्य प्रसाद दीक्षित ने कहा कि पत्रा लाल गुप्त ‘विवश’ जैसे साहित्यकार अपनी रचनाओं के माध्यम से भारत की आत्मा, ग्रामीण जीवन और सनातन संस्कृति का जीवंत चित्र प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति की हजारों वर्षों पुरानी परंपरा को साहित्य के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
‘तिरंगा ध्वज संघर्ष यात्रा’ पुस्तक बनी आकर्षण का केंद्र
कार्यक्रम में लोकार्पित पुस्तक ‘तिरंगा ध्वज संघर्ष यात्रा’ विशेष आकर्षण का केंद्र रही। वक्ताओं ने बताया कि इस पुस्तक में भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के इतिहास, विकास और संघर्ष की विस्तृत जानकारी दी गई है।
पुस्तक में तिरंगे के निर्माण, इसके विकास की यात्रा, विभिन्न कालखंडों में हुए परिवर्तनों तथा वर्ष 1906 से लेकर वर्तमान स्वरूप तक के ऐतिहासिक तथ्यों को शोधपरक तरीके से प्रस्तुत किया गया है। उपस्थित विद्वानों ने इसे राष्ट्रभक्ति और इतिहास के अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण कृति बताया।
देशभर के साहित्यकारों ने किया काव्य-पाठ
इस अवसर पर आयोजित भव्य काव्य गोष्ठी में देशभर से आए लगभग 40 साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। प्रमुख कवियों में कमल आग्नेय, दुष्यंत शुक्ल, राजेन्द्र शुक्ल ‘राज’, डॉ. नीरज पाण्डेय ‘शून्य’, मधुप श्रीवास्तव ‘नरंकाल’, डॉ. पवन द्विवेदी ‘अंगार’, लता द्विवेदी, पिंटू तिवारी, अयोध्या प्रसाद लोधी ‘सुमन’, विनय दीक्षित, वेद प्रकाश सिंह ‘प्रकाश’, डॉ. राम लखन वर्मा, ईश्वर चन्द्र विद्यावाचस्पति, सुनील बाजपेयी, सौरभ शुक्ला, शिव किशोर तिवारी, अरुणेश मिश्रा, शशि नारायण त्रिपाठी, चंदन तिवारी ‘रूद्र’, राम विलास सिंह, कुसुम चौधरी, आलोक शर्मा, इन्द्र प्रकाश द्विवेदी, राम किशोर तिवारी और अमर बहादुर सिंह सहित अनेक साहित्यकार शामिल रहे।
कवियों ने राष्ट्रभक्ति, सामाजिक चेतना, मानवीय संवेदनाओं और भारतीय संस्कृति पर आधारित अपनी रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कई गणमान्य हस्तियां रहीं मौजूद
समारोह में पद्मश्री डॉ. विद्या बिंदु के अलावा अंतरराष्ट्रीय पत्रकार नरेन्द्र भदौरिया, डॉ. गणेश नारायण शुक्ल, डॉ. बी.बी. पाण्डेय, पुलिस विभाग के आईजी डॉ. अखिलेश निगम ‘अखिल’, पूर्व प्राचार्य राम नरेश यादव तथा समीक्षक डॉ. शिवानन्द शुक्ल सहित अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
कार्यक्रम का संचालन राम किशोर तिवारी ‘किशोर’ एवं नीरज पाण्डेय ‘शून्य’ ने संयुक्त रूप से किया। वहीं आयोजन की व्यवस्थाओं का दायित्व पूर्व प्राचार्य रामेश्वर प्रसाद द्विवेदी ‘प्रलयंकर’, जय प्रकाश गुप्ता, ललित प्रकाश गुप्ता, सौरभ, पीयूष, सूरज और आयुष प्रत्यूष ने संभाला।
अतिथियों का हुआ सम्मान
कार्यक्रम के दौरान मुख्य अतिथि एवं विशिष्ट अतिथियों को अंगवस्त्र, स्मृति चिन्ह तथा पुस्तकों का सेट भेंट कर सम्मानित किया गया। उपस्थित विद्वानों, समीक्षकों और साहित्यकारों ने पत्रा लाल गुप्त ‘विवश’ की पुस्तकों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए उनकी साहित्यिक साधना की सराहना की।
निष्कर्ष
लखनऊ में आयोजित यह साहित्यिक आयोजन केवल पुस्तक लोकार्पण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारतीय संस्कृति, राष्ट्रभक्ति और साहित्यिक चेतना के संवर्धन का एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ। कार्यक्रम में व्यक्त विचारों ने यह संदेश दिया कि साहित्य समाज को दिशा देने, सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित रखने और राष्ट्र निर्माण की भावना को मजबूत करने का सशक्त माध्यम है।



