प्रयागराज का 'सीता रसोई मंदिर' क्यों है चर्चा में? राज्य सूचना आयुक्त ने किया दौरा, जानें इस पौराणिक स्थल का इतिहास

प्रयागराज का 'सीता रसोई मंदिर' क्यों है चर्चा में? राज्य सूचना आयुक्त ने किया दौरा, जानें इस पौराणिक स्थल का इतिहास

मां सीता की रसोई पर्वत शंकरगढ़ प्रयागराज में स्थित पर्वत पर गुरु गोरखनाथ पीठ द्वारा स्थापित एवं स्वामी हरि नारायण महाराज जी के सानिध्य में निर्मित हो रहे निर्माण कार्य पर खुशी जताई। 


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प्रयागराज (पूर्वांचल न्यूज प्रिंट)। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले का शंकरगढ़ क्षेत्र इन दिनों सुर्खियों में है। एनटीपीसी (NTPC) से महज 5 किलोमीटर आगे तक गांव के पास स्थित 'मां सीता रसोई मंदिर' इस समय श्रद्धालुओं और प्रशासन के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। हाल ही में राज्य सूचना आयुक्त पी.एन. द्विवेदी ने इस पौराणिक और ऐतिहासिक स्थल का दौरा किया।

मां सीता की रसोई पर्वत शंकरगढ़ प्रयागराज में स्थित पर्वत पर गुरु गोरखनाथ पीठ द्वारा स्थापित एवं स्वामी हरि नारायण महाराज जी के सानिध्य में निर्मित हो रहे निर्माण कार्य पर खुशी जताई। इस दौरान उनके साथ उच्च न्यायालय के अधिवक्ता व विश्व हिंदू परिषद (VHP) विधि प्रकोष्ठ के संयोजक अरविंद कुमार भारद्वाज भी मौजूद रहे। सभी अतिथियों ने यहां गौ पूजन किया और प्रसाद भी ग्रहण किया।

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क्या है सीता रसोई मंदिर का पौराणिक महत्व?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह स्थल त्रेतायुग से जुड़ा हुआ है और इसका बेहद खास पौराणिक महत्व है:

भगवान राम का विश्राम स्थल: जब भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ वनवास जा रहे थे, तब यमुना नदी पार करने के बाद उन्होंने इसी पर्वत पर रात्रि विश्राम किया था।

माता सीता ने बनाया था भोजन: इसी पहाड़ी पर माता सीता ने अपने हाथों से कंदमूल और भोजन तैयार किया था। इसी वजह से इस पावन स्थल को 'सीता रसोई पर्वत' के नाम से जाना जाता है।

गोरखनाथ पीठ के सानिध्य में हो रहे हैं ये बड़े निर्माण

वर्तमान में गुरु गोरखनाथ पीठ द्वारा स्थापित और स्वामी हरि नारायण महाराज जी के सानिध्य में इस क्षेत्र के कायाकल्प का काम चल रहा है। आश्रम परिसर में कई जन-कल्याणकारी परियोजनाओं का निर्माण और अवलोकन किया गया, जिनमें शामिल हैं:

  • मां सीता की रसोई मंदिर का भव्य निर्माण।
  • गौ माता के लिए विशाल गौशाला का संचालन।
  • सामुदायिक भवन और गुरुकुल शिक्षण संस्थान की स्थापना।
  • आश्रम के ठीक सामने 100 बेड का राजकीय सामुदायिक चिकित्सालय (Hospital)।

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यूपी का आखिरी गांव: विकास की दरकार

शंकरगढ़ का यह पर्वतीय इलाका कोल और भील जनजाति समुदाय का बहुल क्षेत्र है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित होने के कारण यह प्रयागराज (इलाहाबाद) जिले का आखिरी गांव है। इसके महज 2 किलोमीटर पश्चिम से मध्य प्रदेश की सीमा शुरू हो जाती है।

भौगोलिक चुनौतियां और बुनियादी सुविधाओं का अभाव

धार्मिक रूप से समृद्ध होने के बावजूद यह क्षेत्र आज भी विकास की मुख्यधारा से कटा हुआ है और अत्यंत पिछड़ा है।

बिजली-पानी का संकट: सीमावर्ती इलाका और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहां के कुछ गांवों में आज भी बिजली और स्वच्छ पेयजल का घोर अभाव है।

सड़क और चिकित्सा की कमी: राज्‍कीय सीमा पर होने की वजह से यहां पक्की सड़कों और बेहतर चिकित्सा सुविधाओं की भारी कमी है, जिसके सुधार के लिए अब प्रयास तेज किए जा रहे हैं। 100 बेड के अस्पताल का निर्माण इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।