यादों के झरोेखों से : आम आदमी की पीड़ा और जीवन दर्शन का अमूल्य स्वर थे कवि-गीतकार शैलेंद्र

यादों के झरोेखों से : आम आदमी की पीड़ा और जीवन दर्शन का अमूल्य स्वर थे कवि-गीतकार शैलेंद्र

Poet-Lyricist Shailendra : आज 30 अगस्त है। भारतीय संगीत और साहित्य के इतिहास में आज का दिन बेहद खास है, क्योंकि इसी दिन 1923 में हिंदी सिनेमा के महानतम गीतकार और संवेदनशील कवि शैलेंद्र (शंकरदास केसरीलाल) का जन्म हुआ था। 

कवि-गीतकार शैलेंद्र: आम आदमी की पीड़ा और जीवन दर्शन का अमूल्य स्वर
फिल्‍म अभ‍िनेता राजकपूर और गीतकार शैलेंद्र। सौजन्य -इंटरनेट
 

शैलेंद्र महज एक गीतकार नहीं थे; वे आम इंसान की धड़कन, उसके दर्द, उसकी उम्मीदों और उसकी जिजीविषा को शब्दों में पिरोने वाले सबसे सच्चे शिल्पकार थे। उन्होंने कठिन से कठिन दार्शनिक बातों को अत्यंत सरल, सहज और आम बोलचाल की भाषा में इस तरह प्रस्तुत किया कि वह हर दिल की आवाज़ बन गई।  

शैलेंद्र के जीवन दर्शन के मुख्य स्तम्भ 

 1. सादगी में ही जीवन का सच्चा सौंदर्य है:  आज के दौर में जब हर तरफ दिखावा और तड़क-भड़क है, शैलेंद्र जी के विचार हमें जड़ों से जुड़े रहने का संदेश देते हैं। 

उन्होंने लिखा था:  "सज्जन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है,न हाथी है ना घोड़ा है, वहाँ पैदल ही जाना है।"

इस एक रचना में जीवन का सबसे बड़ा कड़वा सच छुपा है। शैलेंद्र जी का मानना था कि इंसान चाहे कितनी भी तरक्की कर ले, अंत में उसकी इंसानियत और कर्म ही साथ जाते हैं। जीवन की असली खूबसूरती सरलता और ईमानदारी में है, न कि भौतिक साधनों के संग्रह में। 

 2. संघर्ष और उम्मीद: गिरकर ही इंसान उठता है :शैलेंद्र जी का शुरुआती जीवन अत्यधिक गरीबी और संघर्षों में बीता। रेलवे वर्कशॉप में मैकेनिक का काम करते हुए भी उन्होंने अपने अंदर के कवि को जीवित रखा। 

यही वजह है कि उनकी रचनाओं में कभी निराशा का स्थायी भाव नहीं दिखता, बल्कि हमेशा एक उम्मीद की किरण चमकती है:  

"तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत में यक़ीन कर,अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर।"

"यह विचार आज के युवाओं को यह सीख देता है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, यदि इंसान के अंदर काम करने का जज्बा और उम्मीद है, तो वह अपने पुरुषार्थ से धरती पर भी खुशियों का संसार बना सकता है।

3. इंसानियत और सामाजिक संवेदनशीलता : इप्टा (IPTA) और प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े होने के कारण शैलेंद्र जी के विचारों में हमेशा शोषित, मजदूर और आम आदमी के प्रति गहरी हमदर्दी रही। उन्होंने समाज को बांटने वाली दीवारों के खिलाफ लिखा और प्रेम को ही सबसे बड़ा धर्म माना:

"किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार,किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार,किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार,जीना इसी का नाम है।"  

आज जब समाज में आत्मकेंद्रितता बढ़ रही है, शैलेंद्र जी का यह विचार हमें याद दिलाता है कि दूसरों के आंसुओं को पोंछना और किसी के चेहरे पर मुस्कान लाना ही वास्तव में जीवन का सही अर्थ है।

आज के समय में उनके विचारों की प्रासंगिकता

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में, जहाँ इंसान तनाव, एकाकीपन और अंतहीन प्रतिस्पर्धा से जूझ रहा है, शैलेंद्र जी के गीत और विचार एक ठंडी हवा के झोंके की तरह काम करते हैं। वे हमें सिखाते हैं कि: 

 सफलता का पैमाना पद या पैसा नहीं है: असली सफलता इस बात में है कि आप कितने संवेदनशील इंसान बने रहते हैं।

हार स्वीकार न करना: जीवन के उतार-चढ़ाव केवल एक पड़ाव हैं, अंतिम मंज़िल नहीं।  

अपनी जड़ों का सम्मान: आप जीवन में चाहे जिस मुकाम पर पहुँच जाएं, अपने आम लोगों और अपनी मिट्टी को कभी न भूलें।

गीतकार शैलेंद्र का संक्षिप्त जीवन परिचय (A brief biographical sketch of lyricist Shailendra)

शैलेंद्र जी का जीवन और उनका साहित्य इस बात का प्रमाण है कि सच्चे विचार कभी पुराने नहीं होते। उनकी जयंती पर उनके ये विचार हमें एक बेहतर, अधिक करुणामय और ईमानदार इंसान बनने की प्रेरणा देते हैं।
गीतकार शैलेंद्र की छोटी बायोग्राफी

शुरुआती ज़िंदगी और संघर्ष

मशहूर गीतकार शैलेंद्र का असली नाम शंकरदास केसरीलाल था। उनका जन्म 30 अगस्त, 1923 को रावलपिंडी (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। उनके पुरखे बिहार के आरा (भोजपुर) ज़िले के रहने वाले थे। पैसे की तंगी की वजह से, उनका परिवार रावलपिंडी से मथुरा चला गया, जहाँ शैलेंद्र ने अपना बचपन बिताया और अपनी पढ़ाई पूरी की।

कम उम्र में अपनी माँ और बहन को खोने और बहुत ज़्यादा गरीबी का सामना करने की वजह से, उनकी शुरुआती ज़िंदगी मुश्किलों भरी थी। गुज़ारा करने के लिए, वह मुंबई चले गए और माटुंगा में इंडियन रेलवे वर्कशॉप में मैकेनिक/हेल्पर के तौर पर काम करने लगे।

उनके फ़िल्मी करियर की शुरुआत

रेलवे में काम करते हुए, शैलेंद्र लेफ्ट-विंग कल्चरल ऑर्गनाइज़ेशन IPTA में शामिल हो गए और पोएट्री कॉन्फ्रेंस में कविता सुनाने लगे। एक्टर और डायरेक्टर राज कपूर एक पोएट्री रिसाइटेशन इवेंट में उनकी मशहूर कविता, "जलता है पंजाब" से खास तौर पर इम्प्रेस हुए थे। राज कपूर ने उन्हें अपनी फ़िल्म "आग" के लिए एक गाना ऑफ़र किया, लेकिन स्वाभिमानी शैलेंद्र ने यह कहते हुए मना कर दिया कि वह अपनी कविता नहीं बेचते।

हालांकि, बाद में, जब उन्हें अपनी माँ की बीमारी की वजह से पैसों की बहुत ज़रूरत थी, तो उन्होंने राज कपूर से संपर्क किया। यहीं से 1949 की फ़िल्म "बरसात" के साथ उनके ऐतिहासिक फ़िल्मी करियर की शुरुआत हुई।

बड़ी उपलब्धियां और यादगार काम
  • राज कपूर, म्यूज़िक कंपोज़र शंकर-जयकिशन, सिंगर मुकेश और गीतकार शैलेंद्र की जोड़ी ने भारतीय सिनेमा को कई यादगार गाने दिए। शैलेंद्र ने 170 से ज़्यादा फ़िल्मों के लिए लगभग 800 गाने लिखे।
  • मशहूर गाने:  "आज फिर जीने की तमन्ना है," "किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार," और "सजन रे झूठ मत बोलो ""आवारा हूँ," "मेरा जूता है जापानी," "प्यार हुआ इकरार हुआ ."
  • यादगार फ़िल्में: आवारा, मधुमती, श्री 420, अनाड़ी, यहूदी, गाइड, संगम,और तीसरी कसम।

अवार्ड्स: उन्हें फ़िल्म यहूदी (1958), अनाड़ी (1959), और ब्रह्मचारी (1968) के लिए तीन बार बेस्ट लिरिसिस्ट का फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिला।

आखिरी पल और एक दुखद अंत
शैलेंद्र ने खुद फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी "मारे गए गुलफ़ाम" पर आधारित "तीसरी कसम" (1966) बनाई। यह फ़िल्म एक आर्टिस्टिक मास्टरपीस साबित हुई, लेकिन बॉक्स ऑफ़िस पर इसकी शुरुआती नाकामी ने शैलेंद्र को गहरे कर्ज़ में डाल दिया। अपनों से धोखा मिलने और पैसे की तंगी की वजह से उनकी सेहत बिगड़ती गई और 14 दिसंबर, 1966 को 43 साल की कम उम्र में उनकी मौत हो गई।

उनकी फिल्म "तीसरी कसम" को मरणोपरांत बेस्ट फीचर फिल्म का नेशनल अवॉर्ड मिला।


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