भारत का ऑटो कंपोनेंट उद्योग 2030 तक 200 अरब डॉलर का कारोबार कर सकता है। पश्चिम एशिया संघर्ष के बाद मांग में 12% बढ़ोतरी हुई है।
पूर्वांचल न्यूज़ प्रिंट/ नई दिल्ली। केंद्रीय मंत्री एचडी कुमारस्वामी ने कहा कि ग्लोबल अस्थिरता और सप्लाई चेन में भारी अस्थिरता के बीच, भारतीय ऑटोमोटिव कंपोनेंट इंडस्ट्री को बिजनेस ग्रोथ के नए मौके दिख रहे हैं।
पश्चिम एशियाई संघर्ष के बाद, भारतीय ऑटोमोटिव कंपोनेंट इंडस्ट्री की मांग में 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। भारत दुनिया भर में ऑटोमोटिव कंपोनेंट का एक बड़ा सप्लायर बन गया है। ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ACMA) के सालाना कन्वेंशन में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, इंडस्ट्री ने फाइनेंशियल ईयर 2030 तक लगभग $200 बिलियन (लगभग 17.6 लाख करोड़ रुपये) का टर्नओवर हासिल करने का लक्ष्य रखा है।
ऑटोमोटिव इंडस्ट्री भारतीय अर्थव्यवस्था का एक मज़बूत पिलर
कॉन्फ्रेंस में ऑटोमोटिव इंडस्ट्री के लीडर्स ने कहा कि भारत को अब टेक्नोलॉजी और ग्लोबल कॉम्पिटिटिवनेस का फ़ायदा उठाते हुए एक लीडिंग ग्लोबल ऑटोमोटिव हब बनना चाहिए। सोसाइटी ऑफ़ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) के प्रेसिडेंट, शैलेश चंद्रा ने कहा कि ऑटोमोटिव इंडस्ट्री भारतीय अर्थव्यवस्था का एक मज़बूत पिलर है और इसमें ग्लोबल लेवल पर लीड करने की क्षमता है। गाड़ियों का प्रोडक्शन हर साल रिकॉर्ड बना रहा है, जबकि भारतीय कंपनियाँ एक्सपोर्ट में भी सफलता हासिल कर रही हैं। भारत दुनिया के लिए एक अहम मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी हब बन रहा है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े ऑटोमोटिव मार्केट में से एक
ACMA के प्रेसिडेंट, विक्रमपति सिंघानिया ने कहा कि भारत पहले से ही दुनिया के सबसे बड़े ऑटोमोटिव मार्केट में से एक है। भारत की मैन्युफैक्चरिंग और इंजीनियरिंग क्षमताओं को दुनिया भर में पहचाना जाता है। "भारतीय ऑटोमोटिव इंडस्ट्री का लक्ष्य अब सिर्फ़ इंपोर्ट कम करना नहीं है, बल्कि भारत में डिज़ाइन, भारत में डेवलप, भारत में मैन्युफैक्चर और एक्सपोर्ट के मंत्र को अपनाना है।"
इस मौके पर एक जॉइंट BCG-ACMA रिपोर्ट जारी की गई। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दस सालों में इंडस्ट्री 17 परसेंट की सालाना दर से बढ़ी है और फिस्कल ईयर 2026 तक इसके $86 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। भारत में ऑटोमोटिव कंपनियों का लोकलाइजेशन 70 परसेंट से ज़्यादा हो गया है, जिसका मतलब है कि 70 परसेंट तक कंपोनेंट्स देश में ही बनाए जाते हैं। इसलिए, अगला कदम न सिर्फ कैपेसिटी बढ़ाना होना चाहिए, बल्कि क्षमताओं को भी मजबूत करना चाहिए।
हालांकि, इंडस्ट्री को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। कच्चे माल और एनर्जी की बढ़ती लागत, स्किल्ड लेबर की कमी और घटती-बढ़ती डिमांड टारगेट को पाने में रुकावट डाल सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन जोखिमों के प्रति रेजिलिएंस बढ़ाए बिना $200 बिलियन का टारगेट हासिल करना मुश्किल होगा।
