उप्र विधान सभा चुनाव 2027 नजदीक, ओमप्रकाश राजभर किस ताकत पर बीजेपी को तरेर रहे आंखें !

उप्र विधान सभा चुनाव 2027 नजदीक, ओमप्रकाश राजभर किस ताकत पर बीजेपी को तरेर रहे आंखें !

सुभासपा के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर का भाजपा के साथ 'खट्टा-मीठा' रिश्ता और प्रेशर पॉलिटिक्स की रणनीति हमेशा चर्चा में रहती है।

उप्र विधान सभा चुनाव 2027 नजदीक, ओमप्रकाश राजभर किस ताकत पर बीजेपी को तरेर रहे आंखें !

लखनऊ / पूर्वांचल न्यूज प्रिंट : उत्तर प्रदेश की राजनीति में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर का भाजपा के साथ 'खट्टा-मीठा' रिश्ता और दबाव बनाने (प्रेशर पॉलिटिक्स) की रणनीति हमेशा चर्चा में रहती है। चुनाव और गठबंधन की सियासत में राजभर द्वारा भाजपा को आँख दिखाने या तेवर कड़े करने के पीछे कई ठोस सामाजिक, क्षेत्रीय और राजनीतिक समीकरण हैं:

 पूर्वांचल में राजभर (राजभर-भर) वोट बैंक की निर्णायक मौजूदगी

सघन आबादी: पूर्वांचल के लगभग 15 से 20 जिलों (गाजीपुर, मऊ, बलिया, आजमगढ़, वाराणसी, चंदौली, देवरिया, कुशीनगर, जौनपुर आदि) में राजभर समुदाय की आबादी औसतन 12% से 22% तक है।

जीत-हार का अंतर: दर्जनों विधानसभा सीटों पर यह वोट बैंक किसी भी प्रत्याशी की जीत या हार तय करने का माद्दा रखता है। राजभर जानते हैं कि यदि यह कोर वोटर भाजपा से छिटक गया, तो पूर्वांचल में भाजपा के लिए सीटें बचाना कठिन हो जाता है।

अति पिछड़ा वर्ग (Most Backward Classes - MBC) की गोलबंदी

भाजपा की रणनीति गैर-यादव ओबीसी (कुर्मी, मौर्य, राजभर, निषाद, चौहान, पाल आदि) को एकजुट रखने की रही है।

ओम प्रकाश राजभर खुद को केवल राजभर जाति ही नहीं, बल्कि 'अति पिछड़ा वर्ग' (MBC) की मुखर आवाज के रूप में पेश करते हैं। वे आरक्षण के वर्गीकरण (सब-कैटेगराइजेशन) और जातीय जनगणना जैसे संवेदनशील मुद्दों को हवा देकर भाजपा के ओबीसी समीकरण को असहज करने की ताकत रखते हैं।

 'ट्रांसफरेबल' वोट बैंक की क्षमता (2022 का उदाहरण)

2022 के विधानसभा चुनाव में जब राजभर समाजवादी पार्टी गठबंधन में गए, तो आजमगढ़ (10-0), मऊ और गाजीपुर (7-0) जैसे जिलों में भाजपा का लगभग सूपड़ा साफ हो गया था।

राजभर का यह दावा है कि उनका काडर वोट जिस गठबंधन की ओर मुड़ता है, वह चुनाव परिणाम को पलट सकता है। इस चुनावी ट्रैक रिकॉर्ड को वे भाजपा के सामने मोलभाव (Bargaining) का सबसे बड़ा हथियार बनाते हैं।

दबाव बनाकर सीटें और सत्ता में हिस्सेदारी की लड़ाई (Bargaining Power)

चुनाव से पहले तेवर दिखाना उनकी रणनीतिक शैली है। इसके जरिए वे:

  • आगामी विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी (सुभासपा) के लिए अधिक से अधिक टिकट हासिल करना चाहते हैं।

  • पसंदीदा सीटें अपने काडर के लिए तय करवाना चाहते हैं।

  • कैबिनेट/मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण विभागों पर अपनी दावेदारी मजबूत रखना चाहते हैं।

 सहयोगी दलों की प्रतिद्वंद्विता और क्षेत्रीय वर्चस्व

हाल के समय में गठबंधन (NDA) के भीतर बिहार की पार्टियों—जैसे चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास) या जेडीयू—के पूर्वांचल/यूपी में विस्तार को लेकर भी सुभासपा आक्रामक रही है।

राजभर यह संदेश देना चाहते हैं कि पूर्वांचल के ओबीसी-दलित समीकरण में उनकी जगह कोई बाहरी दल नहीं ले सकता, इसलिए भाजपा उन्हें हल्के में न ले।

 विकल्पों का खुला होना (सपा-कांग्रेस से संवाद की संभावना)

राजभर की सियासत वैचारिक से ज्यादा व्यावहारिक (pragmatic) है। वे कभी भी पाला बदलने में हिचकते नहीं हैं।

भाजपा इस बात से भली-भांति वाकिफ है कि यदि सुभासपा गठबंधन से बाहर होती है, तो विपक्षी दल (सपा-कांग्रेस) उन्हें गले लगाने के लिए तैयार रहते हैं। इसी विकल्प की मौजूदगी उन्हें भाजपा को आंख दिखाने का हौसला देती है।

निष्कर्ष : ओम प्रकाश राजभर का आधार पूर्वांचल के राजभर और अति-पिछड़े वोट बैंक की सघनता, पिछले चुनावों में वोट ट्रांसफर कराने की क्षमता और गठबंधन के दौर में सीटों की जरूरत है। वे अच्छी तरह जानते हैं कि पूर्ण बहुमत की लड़ाई में भाजपा एक-एक प्रतिशत वोट के लिए संवेदनशील रहती है, और इसी नब्ज पर हाथ रखकर वे समय-समय पर अपने तेवर कड़े करते हैं।

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