धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि, कुबेर देव और मां लक्ष्मी की संपूर्ण पूजा विधि, प्रदोष काल शुभ मुहूर्त, यम दीपदान नियम और आरती। जानें सही पूजन विधि।
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- धनतेरस 2026: प्रदोष काल व वृषभ लग्न में पूजन का सर्वश्रेष्ठ शुभ मुहूर्त
- पूजा की आवश्यक सामग्री: इन पावन वस्तुओं के बिना अधूरा है पूजन
- स्टेप-बाय-स्टेप संपूर्ण धनतेरस पूजा विधि: धन्वंतरि, कुबेर व लक्ष्मी पूजन
- यम दीपदान का विशेष नियम: अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति का अचूक उपाय
- धनतेरस के चमत्कारी मंत्र और आरती
धर्म व संस्कृति डेस्क (पूर्वांचल न्यूज़ प्रिंट): कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाने वाला पावन पर्व धनतेरस (धनत्रयोदशी) सनातन परंपरा में आरोग्य, समृद्धि और दीर्घायु का महापर्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान इसी पावन तिथि पर आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वंतरि हाथ में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे।
धनतेरस के दिन धन के अधिपति कुबेर देव, आरोग्यता के दाता भगवान धन्वंतरि और धन-वैभव की देवी मां लक्ष्मी की विशेष आराधना की जाती है। साथ ही शाम को अकाल मृत्यु से रक्षा के लिए यमराज के निमित्त दीपदान (यम दीपदान) करने का विधान है।
1. धनतेरस पूजा का सर्वश्रेष्ठ शुभ मुहूर्त (प्रदोष काल)
शास्त्रों के अनुसार, धनतेरस की पूजा हमेशा प्रदोष काल और स्थिर लग्न (वृषभ लग्न) में करना सर्वोत्तम माना गया है। स्थिर लग्न में की गई पूजा से घर में मां लक्ष्मी और धन-संपदा का स्थायी वास होता है:
- प्रदोष काल: सूर्यास्त के तुरंत बाद शाम के समय प्रदोष काल प्रारंभ होता है।
- वृषभ लग्न (स्थिर लग्न): शाम को स्थिर लग्न का समय कुबेर और लक्ष्मी पूजन के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।
- चौघड़िया मुहूर्त: स्थिर लग्न के साथ-साथ लाभ और अमृत का चौघड़िया भी खरीदारी और पूजन दोनों के लिए शुभ है।
2. पूजा के लिए आवश्यक सामग्री
पूजन शुरू करने से पहले इन सामग्रियों को एकत्र कर लें:
- मूर्तियां/चित्र: भगवान धन्वंतरि, मां लक्ष्मी, भगवान गणेश और कुबेर यंत्र/चित्र।
- पूजन सामग्री: गंगाजल, रोली, अक्षत (बिना टूटे चावल), चंदन, हल्दी, सुपारी, लौंग, इलायची, पान के पत्ते और कलावा।
- नैवेद्य व भोग: बताशे, खील, पंचामृत, पीली मिठाई, फल और साबुत खड़ा धनिया (धनिए के बीज)।
- दीपक व पात्र: पीतल या मिट्टी के दीये, एक बड़ा चारमुखी (चौमुखा) मिट्टी का दीपक, सरसों का तेल, तिल का तेल या शुद्ध देसी घी और रुई की बत्ती।
- नवीन वस्तुएं: आज के दिन खरीदी गई धातु (सोना, चांदी, पीतल के बर्तन आदि)।
3. स्टेप-बाय-स्टेप संपूर्ण पूजा विधि
चरण 1: कलश स्थापना व शुद्धि
- घर के उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) या पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ कर गंगाजल छिड़कें।
- लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला स्वच्छ कपड़ा बिछाएं।
- चौकी पर भगवान गणेश, मां लक्ष्मी, भगवान धन्वंतरि और कुबेर देव की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- स्वयं पर और पूजा सामग्री पर "ॐ अपवित्रः पवित्रो वा..." बोलते हुए गंगाजल का छिड़काव करें और आचमन करें।
चरण 2: भगवान गणेश व धन्वंतरि पूजन
- सबसे पहले प्रथम पूज्य भगवान श्रीगणेश का ध्यान करें। उन्हें दूर्वा, मोदक और जनेऊ अर्पित करें।
- इसके बाद भगवान धन्वंतरि का आह्वान करें। उन्हें रोली, चंदन का तिलक लगाएं और पीले फूल अर्पित करें।
- भगवान धन्वंतरि को पंचामृत, मौसमी फल और घर पर बनी खीर या पीली मिठाई का भोग लगाएं।
- आज खरीदी गई नई धातु या बर्तनों को गंगाजल से धोकर भगवान धन्वंतरि के समक्ष रखें।
चरण 3: कुबेर देव व महालक्ष्मी की आराधना
- कुबेर देव के निमित्त दक्षिण-पूर्व या उत्तर दिशा में दीपक प्रज्वलित करें। कुबेर यंत्र या तिजोरी की चाबी की पूजा करें।
- कुबेर देव को अक्षत, कमल गट्टा, धनिया और कौड़ियां अर्पित करें।
- मां लक्ष्मी को लाल गुलाब, कमल का फूल, खील-बताशे और नए आभूषण/सिक्के अर्पित करें।
चरण 4: साबुत धनिए का पूजन
- धनतेरस पर साबुत खड़ा धनिया खरीदना और पूजना अत्यंत शुभ माना जाता है। एक कटोरी में साबुत धनिया रखकर उस पर रोली-अक्षत लगाएं।
- दिवाली पूजन के बाद इस धनिए के कुछ बीजों को घर के बगीचे/गमले में बोया जाता है और बाकी को लाल कपड़े में बांधकर तिजोरी में रखा जाता है।
4. यम दीपदान: अकाल मृत्यु से रक्षा का विधान
धनतेरस की रात यमराज के लिए दीपदान करना अत्यंत अनिवार्य परंपरा है:
- चारमुखी दीपक: एक पुराना या बड़ा मिट्टी का चारमुखी (चौमुखा) दीया लें।
- तेल व बत्ती: इसमें सरसों या तिल का तेल भरें और चार बत्तियां चारों दिशाओं की ओर लगाएं। दीये में एक कौड़ी या सिक्का और थोड़ा अक्षत डालें।
- दिशा और समय: रात्रि के समय घर के सभी सदस्यों के भोजन करने के उपरांत परिवार का कोई वरिष्ठ सदस्य इस दीये को प्रज्वलित करे।
- स्थान: इस दीपक को घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा (यम की दिशा) की ओर मुख करके कूड़े के ढेर या मुख्य चौखट के पास रखें।
- प्रार्थना मंत्र: दीप रखते समय मन में प्रार्थना करें—"मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह। त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम॥"(भावार्थ: त्रयोदशी के दिन दीपदान करने से यमराज, काल और अकाल मृत्यु के देवता प्रसन्न हों और परिवार की हर अनहोनी से रक्षा करें।)
5. धनतेरस के प्रमुख सिद्ध मंत्र
- भगवान धन्वंतरि आरोग्य मंत्र:"ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतराये अमृतकलश हस्ताय सर्वभय विनाशाय सर्वरोगनिवारणाय त्रिलोकपतये त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूपाय श्री धन्वंतरि स्वरूपाय श्री श्री श्री औषधचक्राय नारायणाय नमः॥"
- कुबेर देव धन प्राप्ति मंत्र:"ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा॥"
- महालक्ष्मी मंत्र:"ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्री सिद्ध लक्ष्म्यै नमः॥"
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1. धनतेरस पर मुख्य रूप से किन देवी-देवताओं की पूजा की जाती है?
धनतेरस के दिन आरोग्य के देवता भगवान धन्वंतरि, धन के कोषाध्यक्ष कुबेर देव, प्रथम पूज्य गणेश जी, मां लक्ष्मी और मृत्यु के देवता यमराज की पूजा की जाती है।
Q2. धनतेरस पूजा का सबसे शुभ समय कौन-सा माना जाता है?
धनतेरस पर पूजन के लिए शाम का प्रदोष काल और स्थिर लग्न (वृषभ लग्न) सबसे उत्तम माना जाता है, क्योंकि इसमें की गई पूजा से घर में स्थायी समृद्धि आती है।
Q3. यम दीपदान किस दिशा में और किस समय किया जाता है?
यम दीपदान शाम या रात्रि के समय घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके किया जाता है। इसके लिए चौमुखा (चारमुखी) सरसों के तेल का दीपक जलाया जाता है।
Q4. धनतेरस के दिन पूजा में साबुत धनिया क्यों चढ़ाया जाता है?
सनातन परंपरा में साबुत धनिया संपन्नता और उर्वरता का प्रतीक है। इसे पूजा में अर्पित करने और बाद में तिजोरी में रखने से वर्ष भर बरकत बनी रहती है।

