सालों से बंद पड़ी 'रायबहादुर की हवेली' के बारे में कई किस्से मशहूर थे, लेकिन कोई नहीं जानता था कि असली खौफ क्या है ?
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| Horror Story : "हवेली का वो इकलौता चिराग, जो सिर्फ मौत की गवाही देता है" |
हॉरर कहानी (Horror Story)
एक था गाँव, जहाँ सदियों पुरानी एक हवेली खड़ी थी। गाँव वाले दिन में भी उसके पास से गुजरने से डरते थे। पर समीर, शहर का एक निडर पत्रकार, इन सब बातों को अंधविश्वास मानता था। वह एक रात कैमरा और टॉर्च लेकर हवेली के अंदर दाखिल हुआ।
अंदर सन्नाटा इतना गहरा था कि समीर को अपनी साँसों की आवाज़ भी साफ़ सुनाई दे रही थी। चारों तरफ धूल और मकड़ी के जाले थे। अचानक, समीर ठिठक गया। हवेली के बड़े हॉल के बीचों-बीच एक पुरानी मेज़ पर एक मोमबत्ती जल रही थी। समीर ने अपनी टॉर्च बंद की। मोमबत्ती की पीली, कांपती हुई रोशनी में हॉल का मंज़र और भी डरावना लग रहा था।
"शायद कोई और भी यहाँ है," समीर ने सोचा।
तभी उसकी नज़र दूर एक ऊँचे, मेहराबदार दरवाज़े पर पड़ी। वहाँ, उस काले अंधेरे में, कोई खड़ा था। एक धुंधली, काली परछाईं। समीर का खून जम गया।
समीर ने हिचकिचाते हुए कहा, "क-कौन है वहाँ?"
कोई जवाब नहीं आया। परछाईं अपनी जगह से हिली तक नहीं। लेकिन तभी, अचानक, उस काले साये के बीच दो पीली, धधकती हुई आँखें खुल गईं। वो आँखें सीधे समीर को घूर रही थीं। उनमें न कोई भाव था, न कोई रहम। सिर्फ एक ठंडी, बेजान भूख।
समीर ने पीछे हटने की कोशिश की, पर उसके पैर जैसे ज़मीन में धंस गए थे। मोमबत्ती की लौ ज़ोर-ज़ोर से फड़फड़ाने लगी। वह साया, वो दो पीली आँखें, धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ने लगीं। हॉल में एक अजीब सी, बर्फ़ीली ठंडक छा गई।
अचानक, मोमबत्ती बुझ गई। पूरा हॉल गहरे अंधेरे में डूब गया। बस वो दो पीली आँखें अब भी समीर के बिल्कुल सामने थीं... और फिर, उस रात हवेली के सन्नाटे को समीर की आखिरी चीख ने तोड़ दिया।
सुबह, गाँव वालों को हवेली का दरवाज़ा खुला मिला। अंदर कोई नहीं था, बस मेज़ पर एक बुझी हुई मोमबत्ती थी और समीर का कैमरा, जिसमें आखिरी तस्वीर उस दरवाज़े की थी... जहाँ अब सिर्फ अंधेरा था।

