भारत का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य उत्तर प्रदेश लंबे समय से प्रशासनिक जटिलताओं, क्षेत्रीय असमानताओं और विकास के असंतुलन की चुनौतियों से जूझता रहा है। इसी पृष्ठभूमि में वर्ष 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री Mayawati ने उत्तर प्रदेश को चार अलग-अलग राज्यों में विभाजित करने का प्रस्ताव रखा था। यह प्रस्ताव भारतीय राजनीति में एक बड़ी बहस का विषय बन गया था।
- प्रश्न यह है कि आखिर मायावती ने ऐसा कदम क्यों उठाया था और उसके पीछे क्या तर्क थे?
चार राज्यों का प्रस्ताव क्या था?
मायावती सरकार ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर राज्य को चार भागों में बांटने की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजी थी।
प्रस्तावित राज्य थे—
- पूर्वांचल
- बुंदेलखंड
- अवध प्रदेश
- पश्चिम प्रदेश (हरित प्रदेश)
मायावती के प्रमुख तर्क
1. प्रशासनिक सुगमता
मायावती का सबसे बड़ा तर्क था कि 20 करोड़ से अधिक आबादी वाले विशाल प्रदेश का प्रभावी प्रशासन एक ही राजधानी से संचालित करना कठिन हो रहा है।
उनका मानना था कि छोटे राज्यों में प्रशासन जनता तक अधिक आसानी से पहुंच सकता है और जवाबदेही बढ़ती है।
2. क्षेत्रीय असमानता दूर करना
- उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में विकास का स्तर समान नहीं रहा है।
- पश्चिमी उत्तर प्रदेश औद्योगिक रूप से अपेक्षाकृत मजबूत है।
- पूर्वांचल लंबे समय से गरीबी, बेरोजगारी और पलायन की समस्या झेल रहा है।
- बुंदेलखंड सूखा और जल संकट से प्रभावित क्षेत्र रहा है।
मायावती का तर्क था कि अलग राज्य बनने पर प्रत्येक क्षेत्र अपनी जरूरतों के अनुसार विकास योजनाएं बना सकेगा।
3. छोटे राज्यों के सफल उदाहरण
मायावती ने तर्क दिया था कि वर्ष 2000 में बने नए राज्यों—
- Uttarakhand
- Chhattisgarh
- Jharkhand
ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रशासनिक परिणाम दिए हैं।
उनके अनुसार उत्तर प्रदेश के विभाजन से भी इसी प्रकार विकास को गति मिल सकती है।
4. पूर्वांचल और बुंदेलखंड की विशेष समस्याएं
पूर्वांचल में—
- स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी
- उद्योगों का अभाव
- बड़े पैमाने पर पलायन
- बाढ़ और कृषि संकट
जैसी समस्याएं लगातार उठती रही हैं।
वहीं बुंदेलखंड में जल संकट और सूखा प्रमुख मुद्दे रहे हैं।
मायावती का कहना था कि अलग राज्य बनने पर इन क्षेत्रों की समस्याओं पर विशेष ध्यान दिया जा सकेगा।
राजनीतिक विश्लेषण
राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि इस प्रस्ताव के पीछे प्रशासनिक कारणों के साथ-साथ राजनीतिक कारण भी थे।
उस समय केंद्र में Indian National Congress के नेतृत्व वाली सरकार थी और उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव नजदीक थे। ऐसे में क्षेत्रीय आकांक्षाओं को संबोधित करने का प्रयास भी इस प्रस्ताव के पीछे माना गया।
हालांकि मायावती और उनकी पार्टी लगातार यह कहती रही कि यह निर्णय पूरी तरह विकास और प्रशासनिक दक्षता को ध्यान में रखकर लिया गया था, यही सच भी था .
प्रस्ताव लागू क्यों नहीं हो सका?
किसी भी राज्य के गठन या विभाजन का अंतिम अधिकार भारत की संसद के पास होता है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा द्वारा प्रस्ताव पारित होने के बावजूद केंद्र सरकार ने इस पर आगे कोई कार्रवाई नहीं की। राजनीतिक सहमति के अभाव और राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन न मिलने के कारण यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका।
पूर्वांचल राज्य की मांग पर प्रभाव
मायावती के प्रस्ताव ने पूर्वांचल राज्य की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया।
हालांकि पूर्वांचल राज्य की मांग इससे पहले भी विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों द्वारा उठाई जाती रही थी, लेकिन 2011 के प्रस्ताव के बाद यह मुद्दा अधिक प्रमुखता से सामने आया।
निष्कर्ष
मायावती द्वारा उत्तर प्रदेश को चार भागों में विभाजित करने की पहल का मुख्य आधार प्रशासनिक सुगमता, क्षेत्रीय संतुलित विकास और छोटे राज्यों की अवधारणा था। समर्थकों का मानना है कि इससे पूर्वांचल, बुंदेलखंड और अन्य पिछड़े क्षेत्रों को विशेष लाभ मिल सकता था, जबकि विरोधियों का तर्क था कि विभाजन से नई प्रशासनिक और वित्तीय चुनौतियां उत्पन्न हो सकती हैं।
आज भी जब पूर्वांचल, बुंदेलखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अलग राज्य की मांग समय-समय पर उठती है, तब 2011 में मायावती द्वारा उठाया गया यह कदम राजनीतिक और विकास संबंधी विमर्श का महत्वपूर्ण संदर्भ बना हुआ है।

