Cockroach Janta Party के विरोध प्रदर्शन से पहले Ex DGP ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है और हर स्थिति में परमिशन जरूरी नहीं होती। पढ़ें पूरी खबर।
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| पूर्व DGP सुलखान सिंह, File Photo |
लखनऊ/नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्लान किए गए विरोध प्रदर्शन से ठीक पहले पूर्व DGP सुलखान सिंह के एक बयान ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है। पूर्व DGP ने कहा कि लोकतांत्रिक सिस्टम में शांतिपूर्ण प्रदर्शन नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है, और सभी हालात में प्रदर्शनों के लिए प्रशासनिक परमिशन की ज़रूरत नहीं है।
पूर्व DGP के अनुसार, भारतीय संविधान के आर्टिकल 19(1)(a) और 19(1)(b) नागरिकों को बोलने की आज़ादी और शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होने का अधिकार देते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ़ किया कि सरकार कुछ हालात में पब्लिक ऑर्डर, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए रोक या शर्तें लगा सकती है।
पूर्व DGP सुलखान सिंह ने क्या कहा?
पूर्व DGP ने कहा कि अगर कोई संगठन या सिविल सोसाइटी ग्रुप शांतिपूर्ण और बिना हिंसा के विरोध करना चाहता है, तो इसे लोकतंत्र का हिस्सा माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि कभी-कभी सिर्फ़ एडमिनिस्ट्रेशन को बताना ही काफ़ी होता है, जबकि परमिट की ज़रूरत जगह, हालात और लोकल नियमों पर निर्भर करती है। उनका बयान कॉकरोच जनता पार्टी के प्लान किए गए प्रदर्शनों से जुड़ा था, जो अलग-अलग पब्लिक मुद्दों पर विरोध करने की तैयारी कर रही है।
प्रदर्शन और पब्लिक ऑर्डर पर बहस
एक्सपर्ट्स का मानना है कि प्रदर्शन की आज़ादी और पब्लिक ऑर्डर के बीच बैलेंस बनाना एडमिनिस्ट्रेशन के लिए एक बड़ी चुनौती है। कभी-कभी, एडमिनिस्ट्रेशन भीड़ मैनेजमेंट, ट्रैफ़िक मैनेजमेंट और सुरक्षा कारणों से परमिट प्रोसेस को ज़रूरी समझता है।
डेमोक्रेटिक अधिकारों की वकालत करने वाले संगठनों का तर्क है कि गैर-ज़रूरी परमिट प्रोसेस से शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों में रुकावट नहीं आनी चाहिए।
पॉलिटिकल सर्कल में चर्चा
पूर्व राज्य पुलिस चीफ़ (DGP) श्री सिंह के बयान के बाद, पॉलिटिकल पार्टियों और सोशल संगठनों के बीच चर्चाएँ तेज़ हो गईं। कुछ ने इसे डेमोक्रेटिक अधिकारों के सपोर्ट में एक ज़रूरी बयान बताया, जबकि दूसरों का मानना है कि किसी भी बड़े पब्लिक इवेंट के लिए एडमिनिस्ट्रेटिव तालमेल ज़रूरी है। निष्कर्ष
जनता केकोआ पार्टी के प्लान किए गए प्रदर्शन से पहले जारी किया गया यह बयान एक बार फिर बोलने की आज़ादी और एडमिनिस्ट्रेटिव कंट्रोल के बीच चल रही बहस को उठाता है। आने वाले दिनों में यह देखना ज़रूरी होगा कि सरकार और ऑर्गनाइज़र प्रदर्शन को लेकर क्या रुख अपनाते हैं और पब्लिक ऑर्डर बनाए रखने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे।

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