तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में मात्र 15 दिनों के भीतर देश को तीन नए राज्य — उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ मिले।
- पूर्वांचल राज्य गठन की मांग और जनआंदोलन पर समीक्षा रिपोर्ट
भारत के राजनीतिक इतिहास में वर्ष 2000 एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में मात्र 15 दिनों के भीतर देश को तीन नए राज्य — उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ मिले। इन राज्यों का गठन क्षेत्रीय असंतुलन, प्रशासनिक उपेक्षा और विकास की जरूरतों को ध्यान में रखकर किया गया था।
आज 25 वर्ष बाद भी उत्तर प्रदेश का विशाल पूर्वी भाग “पूर्वांचल” अपने अस्तित्व, विकास और अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है। सवाल उठता है कि जब छोटे राज्यों के गठन से विकास का नया मॉडल तैयार किया जा सकता है, तो फिर पूर्वांचल को अलग राज्य बनाने की मांग पर राजनीतिक दल और जनप्रतिनिधि चुप क्यों हैं?
पूर्वांचल: संसाधन भरपूर, विकास अधूरा
पूर्वांचल में गाजीपुर, बलिया, मऊ, आजमगढ़, देवरिया, गोरखपुर, वाराणसी, जौनपुर, चंदौली, भदोही, सोनभद्र समेत कई जिले आते हैं। यह क्षेत्र कृषि, संस्कृति, श्रमशक्ति और धार्मिक विरासत में बेहद समृद्ध माना जाता है।
इसके बावजूद क्षेत्र आज भी कई बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है—* भारी बेरोजगारी और पलायन* खराब स्वास्थ्य सेवाएं* उद्योगों का अभाव* शिक्षा व्यवस्था की कमजोरी* प्रति व्यक्ति आय में पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बड़ा अंतर* बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं की स्थायी समस्या
पूर्वांचल के लाखों युवा रोजगार के लिए मुंबई, दिल्ली, पंजाब और गुजरात की ओर पलायन करने को मजबूर हैं।
संसद और विधानसभा में क्यों नहीं उठती आवाज?
पूर्वांचल से बड़ी संख्या में सांसद और विधायक चुने जाते हैं, लेकिन पृथक पूर्वांचल राज्य का मुद्दा शायद ही कभी गंभीरता से सदन में उठता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बड़ी पार्टियां इस मुद्दे को केवल चुनावी भाषणों तक सीमित रखती हैं।
अलग राज्य बनने से प्रशासनिक ढांचा मजबूत हो सकता है, स्थानीय नेतृत्व उभर सकता है और क्षेत्रीय बजट का सीधा उपयोग विकास में हो सकता है। लेकिन सत्ता संतुलन और राजनीतिक गणित के कारण यह मुद्दा लगातार टलता रहा है।
- पूर्वांचल राज्य जनआंदोलन पार्टी का अभियान
इसी राजनीतिक चुप्पी के बीच “पूर्वांचल राज्य जनआंदोलन पार्टी” लगातार अलग राज्य की मांग को लेकर जनजागरण अभियान चला रही है। पार्टी का कहना है कि पूर्वांचल को केवल वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया गया, लेकिन विकास के मामले में हमेशा पीछे रखा गया।
पार्टी के कार्यकारी संयोजक हरवंश पटेल गांव-गांव जाकर लोगों को पृथक राज्य के सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक लाभों के बारे में जागरूक कर रहे हैं।
जनसभाओं, पदयात्राओं और सोशल मीडिया अभियानों के माध्यम से यह आंदोलन धीरे-धीरे जनसमर्थन जुटाने का प्रयास कर रहा है। आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य बन सकते हैं, तो पूर्वांचल की मांग भी पूरी तरह न्यायसंगत है।
छोटे राज्यों का मॉडल और पूर्वांचल
विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे राज्यों में प्रशासनिक निगरानी बेहतर होती है। उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों ने गठन के बाद कई क्षेत्रों में तेज विकास दर्ज किया।
पूर्वांचल समर्थकों का तर्क है कि अलग राज्य बनने से
* स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा
* स्वास्थ्य और शिक्षा बजट बढ़ेगा
* पूर्वांचल एक्सप्रेसवे जैसे प्रोजेक्ट्स का लाभ गांवों तक पहुंचेगा
* उद्योग और निवेश को बढ़ावा मिलेगा
* पलायन में कमी आएगी
निष्कर्ष
पूर्वांचल राज्य की मांग केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि क्षेत्रीय असमानता और विकास के अधिकार से जुड़ा मुद्दा बनती जा रही है।
जब देश में 15 दिनों के भीतर तीन नए राज्यों का गठन संभव हो सकता है, तो पूर्वांचल की दशकों पुरानी मांग पर लगातार चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। आने वाले समय में यह मुद्दा उत्तर प्रदेश की राजनीति में और बड़ा रूप ले सकता है, खासकर तब जब क्षेत्रीय असंतोष लगातार बढ़ रहा है।
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